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Home » इंसान का पिता के रोल में रहने का तात्पर्य है कि वो अपने बच्चों का पालन पौषण तथा सुरक्षा करें
शिक्षा व रोजगार

इंसान का पिता के रोल में रहने का तात्पर्य है कि वो अपने बच्चों का पालन पौषण तथा सुरक्षा करें

Naresh Beniwal
By
Naresh Beniwal
Published: July 5, 2025
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9 Min Read
A man's role as a father means that he should nurture and protect his children.

लेखक
नरेंद्र यादव
नेशनल वाटर अवॉर्डी
युथ एंपावरमेंट मेंटर

इस धरती पर हर इंसान जीवन में कई प्रकार के रोल निभाता है, जिसमें कभी सफल होता है तो कभी कभी किसी रोल में असफल भी हो जाता है। एक ही इंसान कभी बेटा, कभी भाई, कभी पति, कभी चाचा ताऊ भतीजे, तो कभी पिता के रोल में देखता है। मानव जीवन में पिता का रोल तथा बड़े भाई या बड़ी बहन का रोल सबसे महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि यह रोल परिवार के अन्य सदस्यों के लिए मार्गदर्शन का कार्य करता है, वैसे तो हर इंसान को अपनी बहुत सी जिम्मेदारियों का निर्वाहन करना पड़ता है परंतु जो सबसे ज्यादा महत्व रखती है वो पिता के रूप में होती है। पिता शब्द संस्कृत भाषा के पितृ शब्द से आया है।

 

 

पितृ शब्द पा धातु से बनता है जिसका अर्थ है रक्षा करना। पिता बच्चें को जन्म ही नहीं देता है बल्कि उसके पालन पौषण की सम्पूर्ण जिम्मेदारी तथा उनकी सुरक्षा की जवाबदेही भी एक पिता पर होती है। पिता शब्द आजकल चलन में कम ही है, अब तो बच्चें पिता के स्थान पर पापा या डैडी या डैड शब्द का उपयोग करने लगे है। लेकिन सम्मान पिता जी शब्द में ही झलकता है, शायद दूसरे शब्द उतना प्रभावशाली नहीं होते है। हमारे यहां माता जी वा पिता जी शब्द अधिक सम्मानित माने जाते है, आप सभी ने देखा होगा कि जो लोग अपने मातापिता को अधिक सम्मान देते है वो उन्हें माता जी तथा पिता जी कहकर संबोधित करते है,

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कुछ लोग बाबा या बापू कह कर भी संबोधन करते है। खैर ये तो शब्दों की बात हुई लेकिन इस विश्व में एक दिन माता के लिए या पिता के दिवस के रूप में मनाया जाता है, शायद यही दर्शाने के लिए कि पिता के महत्व को सभी पिता भी समझे और बच्चे भी समझे। यहां एक बात और स्पष्ट करने की जरूरत है कि पिता जी और बच्चों में कोई प्रतिस्पर्धा नहीं है। इस दुनिया में एक पिता ही है जो अपने बच्चों से कॉम्पिटिशन या ईर्ष्या नहीं करता, बाकी सभी एक दूसरे से प्रतिस्पर्धा और ईर्ष्या या द्वेष करते है, यहां तक कि सगे भाई बहन भी एक दूसरे से ईर्ष्या द्वेष करते है। यह सच्चाई है कि ये भी एक दूसरे की सफलता या समृद्धि को पचा नहीं पाते है। हां, एक रिश्ता और है जिसका मैने पहले भी जिक्र किया है वो बड़ा भाई या फिर बड़ी बहन होती है जो अपना करियर छोड़कर भी अपने छोटे भाई बहनों के लिए न्यौछावर कर देते है, और उन्हें इस बात में खुशी तथा गर्व होता है। इस धरती पर हर इंसान को अपने रिश्ते की गरिमा का ख्याल रखना चाहिए, क्योंकि कुछ रिश्ते होते है जिनका छोटे सम्मान करते है लेकिन इसके विपरित कुछ ऐसे महानुभाव होते है जो ऐसे रिश्तों में भी शोषण करने की मंशा रखते है या उनके साथ अन्याय करने की कौशिश करते है। जब हम पिता के रोल में आते है तो हमारे ऊपर बहुत सी जिम्मेदारी आ जाती है, उनका निर्वाहन करना बेहद जरूरी होता है।

 

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वैसे तो हमारे शास्त्रों में कर्ता और कर्म के भाव को ओ
बताया गया है, जैसे कुछ लोग प्रवचन के माध्यम से केवल चरित्र निर्माण की बात करते है लेकिन मैं यहां वेदांत की बात करता हूं कि किसी भी इंसान को जीवन में रियल होना चाहिए, इससे जीवन वा रिश्तों की वास्तविकता पर ध्यान दिया जाता है। हम अपने कर्मों को सुधारने की बात तो करते है परंतु भीतर से अपने कर्ता भाव को परिष्कृत करने का प्रयास कम ही करते है, क्योंकि जब तक हम अपने कर्ता भाव को उच्च श्रेणी का नहीं बनाएंगे तो फिर हमारे कर्म में दिखावा भी हो सकता है। वेदांत कहता है कि खुद को बदलो, दूसरों को बदलने से कहीं अच्छा है कि स्वयं में बदलाव किया जाए। यही तो हम कह रहे है कि वेदांत में दोगलापन नहीं है, पाखंड नहीं है, किसी को छलने की बात नहीं है, किसी का शोषण करने का भाव नहीं है, जो एक इंसान को होना चाहिए, उसी का पालन करने की बात कही गई है। आज आधुनिकता के नाम पर हम अपने बच्चों के साथ वैसे ही बनने की कौशिश करते है जिससे बच्चें भी असहज होते है और हमारी परम की ओर बढ़ने की यात्रा में भी विघ्न आता है। यहां पिछड़ेपन या आधुनिकता के नकली चोले की बात नहीं है।

 

 

 

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इंसान को अपनी उच्चता की ओर बढ़ने की चेष्टा ही तो आगे लेकर जाएगी। कुछ पिता कहते है कि हम अपने बच्चों के दोस्त बन कर जीते है। ऐसे महानुभावों को मै कहना चाहता हूँ कि दोस्त बनना व पिता बनने में बहुत अंतर है, उनसे स्नेह करने में और उनके साथ नाचने वा मदिरापान करने में एक बड़ा फर्क है। मैं यही कहना चाहता हूँ कि पिता या माता होने के नाते आप अपनी खुशी के साथ साथ अपने बच्चों को भी शारीरिक रूप से तथा मानसिक रूप से सशक्त बनाने की योजना रखे। अपने बच्चों के पालन पौषण में किसी भी प्रकार की कोताही ना बरते, उन्हें वो सभी सीख दें, जो उनके जीवन में काम आने वाली है। एक पिता होने के नाते, या एक मां होने के नाते अपने बच्चों से अदब का एक दायरा जरूर रखे, उनकी हर गतिविधि में घुसने से अच्छा होगा कि उन्हें स्पष्ट रूप से शिक्षित दीक्षित करें ताकि उन्हें किसी प्रकार की समस्या का सामना या किसी अन्य के सामने झुकने की जरूरत पड़े। बच्चों को कंट्रोल करने की बजाय उन्हें जवाबदेह बनाए। मैं यहां कुछ बाते रखना चाहता हूं, जो एक पिता अपने बच्चों के साथ साझा कर सकते है, जैसे :
1. उनके स्वास्थ्य को बेहतर रखने संबंधी बातों का जरूर अभ्यास कराएं, जैसे प्रातः जल्दी उठना, उठते ही पानी पीना, रोज नहाना, व्यायाम करना, दौड़ लगाना, दंड करना, रोज कुछ समय के लिए मेडिटेशन करना, पौष्टिक आहार लेना।
2. महापुरुषों के विषय में चर्चा करना।
3. किशोर होते बच्चों को हर रोज प्रातः अपनी देखरेख में व्यायाम अथवा दौड़ जरूर कराना। उनकी ऊर्जा को पठन पाठन वा व्यायाम में लगाने को प्रेरित करें।
4. हर दिन शाम को आराम से बैठकर अपने बच्चों से इंटरेक्शन जरूर करें, उनसे बातचीत करें, चर्चा करे।
5. अपने बच्चों को उनके भविष्य के आयामों के विषय में महत्वपूर्ण जानकारी दें।
6. बच्चों को नशे से दूर रखने के लिए हर दिन शाम को अपने घर की लाइब्रेरी में साथ बैठ कर पढ़ने का वातावरण बनाए।
7. हर बच्चें को एक ऐसी विद्या में निपुण करे जो संगीत या इंस्ट्रूमेंट से संबंधित हो।
एक पिता होने के नाते अपने कर्तव्यों का निर्वाहन करने के साथ साथ अपनी गरिमा तथा अपने आत्मिक उत्थान का भी ख्याल करें। किसी के प्रभाव या अभाव में आकर अपने बच्चों को बेसहारा ना छोड़ें, क्योंकि एक दिन की दूरी भी कई बार बहुत नुकसान कर जाती है। उनके भीतर ऐसा अभ्यास जगाए कि वो खुद से पढ़ने लिखने में रुचि लेने लगे, और वो उनका जुनून बन जाए।
जय हिंद, वंदे मातरम

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