jodkiya sirsa Gaon Ki Kahani 200 साल बाद भी तरक्की से दूर: जोड़कियां गांव की सच्चाई
jodkiya sirsa Gaon Ki Kahani राजस्थान की सीमा से सटे हरियाणा के सिरसा जिले के पैंतालिसा क्षेत्र का गांव जोड़कियां (जोडिय़ां, जोड़ावाली) अपने आप में करीब 200 वर्ष पूराना इतिहास समेटे हुए है। करीब 21 00 की आबादी वाले इस छोटे से गांव का रक्बा 2500 बीघा है। व करीब 1200 मतदाता अपना प्रतिनिधि चुनकर देश की प्रजातान्त्रिक प्रणाली को मजबूती प्रदान करते हैं।
- jodkiya sirsa Gaon Ki Kahani 200 साल बाद भी तरक्की से दूर: जोड़कियां गांव की सच्चाई
- सबसे बड़ी समस्या: नाम की पहचान में उलझा गांव
- गांव का इतिहास व सामाजिक ताना बाना
- गांव का पहला सरंपंच jodkiya sirsa Gaon Ki Kahani
- धार्मिक ऐतिहासिक धरोहर
- गांव शिक्षा व सरकारी सेवा में भी है पिछड़ा
- विकास कार्या में पिछड़ा हुआ है गांव
सबसे बड़ी समस्या: नाम की पहचान में उलझा गांव
इस गांव की सबसे अनोखी और गंभीर समस्या है—इसके नाम को लेकर भ्रम। गांव में पेयजल,खेल सुविधा, शिक्षा, बस सेवा, स्वास्थ्य सेवाएं,बिजली आपूर्ति, जैसी आवश्यक सेवाएं बेहद लचर हैं। इन समस्याओं के साथ ही 200 वर्ष बाद भी गांव के लोगों को गांव के नाम को लेकर काफी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। ग्रामीणों ने बताया कि गांव को सरकारी रिकार्ड व बोलते नाम के आधार पर तीन नामों से पुकारा जाता है जोड़कियां,जोडिय़ां व जोड़ावाली। गांव के नाम के कारण डाक सुविधा में भी हमेशा गड़बड़ होती रहती है। बीमार होने पर 30 किलोमीटर दूर सिरसा जाना पड़ता है। ग्रामीणों का मुख्य व्यवसाय खेती है तथा पशु पालन है। विकास कार्यो के मामले गांव अभी भी काफी पिछड़ा हुआ है। गांव में माहौल शान्तिपूर्वक व सौहार्दपूर्ण है।
गांव का इतिहास व सामाजिक ताना बाना
सिरसा जिला मुख्यालय से मात्र 30 किलोमीटर दूर चोपटा खंड का छोटा सा विकास से कोसों दूर गांव जोड़कियां में बारिश होने पर किचड़ से सनी गलियों से गुजरते हुए गांव के गोपालपुरी डेरे में बैठे बुजर्गों से गांव के इतिहास व समस्याओं पर बात की तो बुजुर्गों ने बताया कि राजस्थान की सीमा से सटा होने के कारण राजस्थानी व बागड़ी भाषा बोली जाती है। बुजर्गों ने बताया कि इस गांव का रक्बा पहले निकट के गांव रूपावास का हिस्सा था।
रूपावास से यहां पर खेती करने के लिए आना पड़ता था, आवागमन के साधनों की कमी के कारण यहां पर जिनकी जमीन थी उन्हें काफी परेशानी उठानी पड़ती थी, यहां पर पीने के पानी की जोहडिय़ां बनी हुई थी, तो इस जगह को जोहड़ी वाली जगह के नाम से पुकारा जाता था, रूपावास से हुड्डा, चुरनियां व ढाका ग्रौत्र के लोग जिनकी जमीन यहां थी उन्होनें यहीं बसने का मन बना लिया व गांव को जोड़ावाली के नाम से पुकारा जाने लगा। बाद में धाीरे धीरे जोड़कियां व सरकारी रिकार्ड में जोडिय़ां नाम पुकारा जाने लगा। बाद में यहां पर भाकर, बैनीवाल,डूडी, कस्वां,खालिया, मोगा, देहड़ू, कुम्हार ग्रौत्र के लोग आकर बस गए। । गांव की अधिकतर आबादी जाट है। तथा सभी लोग आपसी भाईचारे के साथ रहते हैं।
गांव का पहला सरंपंच jodkiya sirsa Gaon Ki Kahani
गांव में पहला संरपंच कुताना व जोड़कियां की सयुंक्त ग्राम पचांयत राजेराम बैनीवाल को बनाया गया । उसके बाद जोड़कियां की अलग ग्राम पंचायत का गठन हाने के बाद जगमाल चूरनियां को बनाया गया। उसे बाद हसराम, नत्थू राम, सरोज डूडी, दलबीर, ख्यालीराम, प्रभु राम, लिछमा देवी(सर्व सम्मति) ओर देवतराम ने गांव की कमान संभालते हुए विकास कार्य करवाए व वर्तमान में गांव का पढा लिखा युवा सरपंच राकेश कुमार अपने वार्ड पचों की टीम के साथ गांव में विकास कार्य करवाने में जुटा है। गांव से कर्नल मेहर चंद रिटायर्ड फौज में कार्यरत होकर देश सेवा की है।
धार्मिक ऐतिहासिक धरोहर
गांव में अति प्राचीन हनुमान मन्दिर, रामदेवजी का रामदेवरा, जाहरवीर गोगाजी की गोगामेड़ी, माताजी का मन्दिर बना हुआ है। जिनमें सभी गांव के लोग पूरी आस्था से पूजा अर्चना करते हैं। गांव में बाबा गोपालपुरी का डेरा व भगवान शिव का मन्दिर बना हुआ है, जिसके प्रति लोगों की अटूट आस्था है। सिद्ध बाबा गोपालपुरी 12 वर्ष तक यहीं तपस्या की थी, यहां पर बाबा गोपाल पूरी का धूणा है, जहां पर अखंड ज्योत जलती रहती है। व डेरे में हर वर्ष बाबा के निर्वाण दिवस पर जागरण व भंडारा आयोजित किया जाने लगा। तथा शुक्ल पक्ष के मंगलवार को भी गांव के लोग पूरी आस्था के साथ यहां पूजा अर्चना करते हैं। वर्तमान में डेरे में भूप सिंह महाराज मन्दिर व आश्रम में पूजा अर्चना करते हैं। मान्यता है कि यहां सच्चे मन से धोक लगाने से मनोकामना पूरी होती है। गांव में प्राचीन चार जोहड़, एक कुआं व पीपल के पूराने पेड़ गांव की शोभा बढाते हैं।
गांव शिक्षा व सरकारी सेवा में भी है पिछड़ा
ग्रामीणों ने बताया कि गांव में एक मात्र मिडल सरकारी स्कूल है। उसमें भी अक्सर अध्यापको की कमी रहती है। आठवीं के बाद पढाई के लिए दूसरे गांव रूपावास या रामपूरा ढिल्लों गावों के स्कूलों में जाना पड़ता है, कालेज स्तर की पढाई के लिए तो गांव से 30 किलोमीटर दूर सिरसा जाना पड़ता है। बस सुविधा का अभाव होने के कारण अधिकतर मा-बाप अपनी लड़कियों की पढाई छुड़वा लेते है। उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए के लिए दूर दूर शहरों में जाना पड़ता है। साधन सम्पन्न लोग तो अपने बच्चों को पढा लेते हैं लेकिन गरीब मंा बाप बच्चों को उच्च शिक्षा नहीं दिलवा पाते। गांव का सरपंच व युवा कल्ब के सदस्य स्कूल का दर्जा बढानें के लिए प्रयासरत हैं। गांव से बहुत कम लोग सरकारी सेवा में है।
विकास कार्या में पिछड़ा हुआ है गांव
ग्रामिणों ने बताया कि गांव के तीन नामों के कारण आवश्यक डाक व अन्य सामग्री दूसरे गावों में पहुंच जाती है जिससे उन्हें सुचनाऐं सही समय पर नही मिल पाती। राज्य के अन्तिम छोर पर पडऩे के कारण विकास कार्यो के मामले गांव अभी भी काफी पिछड़ा हुआ है। गांव में दो आंगनबाड़ी केंद्र है जिनकी बिल्डिग खस्ता हालत में है। जलघर बना हुआ है। लेकिन पीने पानी की हमेशा कमी रहती है। गांव में न तो स्वास्थ्य केंद्र है,नहीं डाकखाना है। पशु हस्पताल में पशु चिकित्सा ठीक ठाक है। गांव में कुछ गलियां अभी भी कच्ची हैं व पानी निकासी का उचित प्रबंध नही है। हमेशा बिजली की कमी रहती है। बस सुविधा पर्याप्त नही है। बस सुविधा न होने के कारण ग्रामीणों को काफी परेशानी का सामना करना पड़ता है।
ग्रामीण यह मांग गांव में आने वाले नेता व अधिकारियों के सामने कई बार रख चुके हैं। लेकिन इस समस्या का समाधान नही हो पा रहा है। गांव में खेल का मैदान तो है पर खेलों का सामान व आवश्यक सुविधा न होने के कारण खिलाड़ी आगे बढने से वचिंत रह जाते है।
