फतेहाबाद। जिले के युवाओं ने पारंपरिक खेती और रोजगार के रास्ते से अलग हटकर नई तकनीक और हुनर को अपनाकर अपनी पहचान बनाई है। किसी ने उन्नत किस्म की घीया की खेती से आमदनी बढ़ाई तो किसी ने नियंत्रित वातावरण में मशरूम उत्पादन को व्यवसाय का रूप दिया। वहीं एक युवा ने फूलों की खेती से लाखों रुपये का मुनाफा कमाने का रास्ता चुना। बनगांव के सुरेंद्र जाखड़ ने साइकिलिंग को करियर बनाया और अब भारतीय साइकिलिंग टीम के साथ प्रशिक्षक के तौर पर काम कर रहे हैं।
पांच फीट तक लंबी घीया उगाकर बढ़ाई कमाई
गांव भूथन खुर्द के युवा किसान रवि पुनिया ने पारंपरिक फसलों के बजाय शिवानी किस्म की घीया की खेती शुरू की। उनकी घीया करीब पांच फीट तक लंबी हो रही है। रवि के अनुसार पारंपरिक फसलों में लागत और मेहनत के मुकाबले आमदनी सीमित थी। इसके बाद उन्होंने उन्नत किस्म के साथ सिंचाई, खाद और रोग नियंत्रण जैसी तकनीकों पर ध्यान दिया। इससे उत्पादन और गुणवत्ता में सुधार हुआ और वह घीया की खेती से सालाना लाखों रुपये का मुनाफा कमा रहे हैं।
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14 वातानुकूलित कक्षों में मशरूम उत्पादन
आकांवाली गांव के किसान अवतार सिंह ने करीब आठ साल पहले छोटे स्तर से मशरूम उत्पादन शुरू किया था। अब उन्होंने दो एकड़ जमीन में 14 वातानुकूलित कक्ष बनाए हैं। इनमें तापमान और नमी को नियंत्रित कर मौसम के अनुसार मशरूम का उत्पादन किया जाता है। बिजली की जरूरत के लिए सोलर सिस्टम भी लगाया गया है। अवतार सिंह के अनुसार मशरूम उत्पादन कम जमीन में भी अच्छी आमदनी का जरिया बन सकता है। वह इससे सालाना करीब आठ लाख रुपये का मुनाफा कमा रहे हैं।
एक एकड़ में गेंदा उगाकर तीन लाख रुपये का मुनाफा
गांव खजूरी के युवा किसान अनूप ने पारंपरिक फसलों की जगह फूलों की खेती को चुना। वह एक एकड़ में गेंदा उगाकर सालाना करीब तीन लाख रुपये का मुनाफा कमा रहे हैं। वह अपनी फसल दिल्ली, गुरुग्राम और रेवाड़ी की मंडियों में बेचते हैं। शादी-विवाह और धार्मिक आयोजनों में मांग होने के कारण उन्हें इन मंडियों में बिक्री का बाजार मिल रहा है।
गांव से भारतीय साइकिलिंग टीम तक पहुंचे सुरेंद्र
बनगांव के सुरेंद्र जाखड़ ने साइकिलिंग में करियर बनाया। वर्ष 2017 में पटियाला स्थित नेताजी सुभाष राष्ट्रीय खेल संस्थान से एक वर्षीय डिप्लोमा करने के बाद उनका चयन एशियन साइकिलिंग चैंपियनशिप में प्रशिक्षक के रूप में हुआ। वर्ष 2021 तक कर्नाटक में प्रशिक्षक रहने के बाद वह पिछले तीन वर्षों से भारतीय साइकिलिंग टीम के साथ काम कर रहे हैं। फिलहाल उनकी तैनाती तमिलनाडु में है। सुरेंद्र के अनुसार शुरुआत में उनके पास विशेष साइकिल तक नहीं थी। मेहनत के बाद उन्होंने अपनी साइकिल खरीदी। अब वह छुट्टियों में गांव और आसपास की अकादमियों में युवाओं को साइकिलिंग के लिए प्रेरित करते हैं।

