चोपटा, 02 सितंबर। राजस्थान की सीमा से सटे चोपटा क्षेत्र में सरकार व सिंचाई विभाग द्वारा नहरी पानी में कटौती करने के बाद व बारिश की कमी के कारण करीब 60 हजार हेक्टेयर में खड़ी सावनी की फसल पर सूखे का संकट गहराता जा रहा है। सावन के महीने में कम बारिश व भादो मास सूखा बीत जाने के बाद करीब 15000 हेक्टेयर में बिरानी ग्वार व बाजरे की फसल सूख क र नष्ट होने की कगार पर है। उधर कपास व नरमें की फसल को सूखे से बचाने के लिए किसानों को नलकूपों द्वारा सिंचाई के लिए काफी जदोजहद करनी पङ़ ही है।
भूमिगत जल खारा होने के कारण जमीन भी खराब हो रही है। नहरी पानी प्र्याप्त मात्रा में मिल जाये तो कपास व नरमें को तो बचाया जा सकता है। क्षेत्र का किसान सिर पकड़कर बैठा है और सरकार व प्रकृति से राहत की आस में दिन काट रहें हैं। चोपटा खंड में इस बार किसानों ने 25200 हेक्टेयर में नरमें व कपास, 13700 हेक्टेयर में धान, 16000 हेक्टेयर में गवार व 1990 हेक्टेयर में बाजरे की बिजाई की है। जो कि नहरी पानी के अभाव में बर्बादी के कगार पर है। किसानों का कहना है कि अगर नहरी पानी में इसी तरह से कटौती जारी रही तो कृषि आय दोगुनी तो क्या खेती करना ही मुश्किल हो जाएगा।
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पैंतालिसा क्षेत्र के गिगोरानी, रामपूरा ढि़ल्लों, कुम्हारिया, कागदाना, खेड़ी, जसानिया, हजीरा, नाथूसरी, शाहपूरिया, चाहरवाला, शक्करमन्दोरी, रूपावास, रामपूरा नवाबाद, सहित दर्जनों गांवों में नहरी पानी की कमी व बारिश के अभाव में अकाल व सूखे कि चपेट में हैं। किसानों को बरसात का इंतजार है। नहरी पानी की कमी के कारण क्षेत्र की अधिकतर जमीन बिरानी है। आषाढ़ मास में हुई हल्की बारिश होने पर किसानों ने बिरानी ग्वार व बाजरे की बिजाई तो यह सोचकर कर दी कि आगे सावन भादो में मानसून कि बारिश होने पर फसल अच्छी हो जाएगी।
लेकिन अब बारिश का समय निकलता जा रहा है। पानी की कमी के कारण ग्वार व बाजरे की फसल पूरी तरह सूख चूकी है। सरकार ने नहरी पानी में कटौती कर दी है। किसान विक्रम सिंह व श्रवण कुमार का कहना है कि नहरों में पानी दो सप्ताह के लिए चलता है। लेकिन अब एक सप्ताह के लिए चलता है जिससे सिंचाई पूरी नहीं हो पाती। अगर जल्दी बारिश नहीं हुई तो सावनी की फसल पूरी तरह से चौपट हो जाएगी। ऐसे में कर्ज का बोझ कम होने की बजाए बढ़ जाएगा।
किसान सुल्तान सिंह,महेन्द्र सिंह,माँगे राम का कहना है कि यह क्षेत्र नहरों के अन्तिम छोर पर पडऩे के कारण यहां अक्सर नहरी पानी कि कमी रहती है। इस बार तो सरकार व सिंचाई विभाग ने पानी सप्लाई में कटोती करके कोढ़ में खाज का काम किया है। इनका कहना है कि सिचाई के लिए बरसात व टयूबवैलो पर निर्भर रहना पड़ता है। अब कपास व नरमें की फसल को तो मँहगे दामों पर डीजल खरीदकर टयूबवैलो से सिंचाई करके जैसे तैसे बचाया जा रहा है। लेकिन बारिश न होने के कारण बिरानी ग्वार व बाजरे की फसल को बचा पाना काफी मुश्किल है।
नहरों में पानी प्र्याप्त मात्रा में मिल जाए तो कम से कम कपास व नरमें को तो बचाया जा सकता है। किसान राज कुमार,जगदीश व सुभाष चन्द्र का कहना है कि बिरानी ग्वार में खर्चा कम पड़ता है तथा उत्पादन अच्छा होने पर बचत ज्यादा हो जाती है। इसलिए इस बार ग्वार की बिजाई ज्यादा कि लेकिन इस बार मानसून की बेरूखी ने तो उनके सपनों पर ही पानी फेर दिया। इनका कहना है कि कपास व नरमें की फसल पर तो बीज, रासायनिक खाद व कीटनाशक दवाओं का खर्चा भी ज्यादा हो जाता है। उपर से सिंचाई का खर्च उठाना पड़े तो यह फसल पूरी तरह से घाटे का सौदा साबित होती है। रणधीर सिंह का कहना है कि पशुओं के लिए हरे चारे का संकट उत्पन हो गया है। इनका कहना है कि सावन व भादो मास का महीना सूखा बीत जाना भंयकर अकाल का लक्षण है
वर्जन
इस बार चोपटा खंड में किसानों ने 25200 हेक्टेयर में नरमें व कपास, 13700 हेक्टेयर में धान, 16000 हेक्टेयर में गवार व 1990 हेक्टेयर में बाजरे की बिजाई की है। कपास व नरमे की फसल तो ठीक ठाक है लेकिन बिरानी ग्वार व बाजरे की फसल में बारिश की जरूरत है। अगर जल्दी बारिश नहीं हुई तो फसलो का उत्पादन कम हो सकता है। — डॉ. शलैंदर सहारण कृषि विकास अधिकारी

