लेखक
नरेंद्र यादव
नेशनल वाटर अवॉर्डी
युथ एंपावरमेंट मेंटर
जीवन में अगर मानवता की ओर बढ़ना है तो उसके लिए सबसे बेहतरीन समय कौन सा होगा, इस पर विमर्श करने की जरूरत है। यूं तो हर जीव जीवन को जी रहे है लेकिन कहते है 84 लाख योनियों में से 83 लाख 99 हजार 9 सौ 99 के अलावा एक योनि है जिसमें मनुष्य का जन्म होता है, ये गणित तो सभीये की श्रद्धा का विषय है कि कोई इस विचार को मानते है कि नहीं। यहां बात यह नहीं है कि कितनी योनियों के उपरांत मनुष्य का जन्म मिलता है, ये ना तो किसी ने देखा है और ना ही कोई देख पाएगा, परंतु अब जब मनुष्य जन्म मिल चुका है तो इसे कैसे मानवता की कसौटी पर खरा उतारे, चर्चा इस बात की है।
श्रीमद्भगवद् गीता में भगवान श्री कृष्ण जी ने कहा है कि हे अर्जुन कितने ही जन्म तुम्हारे हुए है और कितने ही बार मैं इस धरती पर अवतरित हुआ हूँ इसकी कोई गिनती नहीं है इसलिए सोचना यह है कि इंसान इस धरती पर क्या उद्देश्य लेकर आया है उसे पूरा किया जा रहा है या नहीं। ये इंसानी जीवन एक ही है और इसमें में भी बहुत कम समय है। इसका उपयोग कैसे किया जा रहा है यह विचारणीय है। जीवन की धारा तो एक ही होती है परंतु हमने इसे बहु धारा का रूप देकर मुसीबतों को बुलावा दिया है। अगर जीवन का वास्तविक अर्थ समझना है तो एकांत में जीना शुरू करो। मानवता को गढ़ने के लिए किसी को भी दिन के 24 घंटों में से ही उस समय का चयन करना होगा, जिसमें सबसे कम डिस्टरबेंस हो। अगर कोई विद्यार्थी या युवा सोचें कि मैं सुबह देर से सोकर उठकर भी अपना निर्माण कर सकता हूं, तो वो भूल करेगा।
खुद को सशक्त बनाना है तो फिर प्रातः जल्दी उठने के लिए अपनी दिनचर्या में परिवर्तन करना ही होगा अन्यथा सब व्यर्थ जाने वाला है। मानव निर्माण के लिए सबसे पहली जरूरत है कि हमारा शरीर स्वस्थ रहें, दूसरी जरूरत है कि हम मानसिक रूप से नियंत्रित वा मजबूत रहे, तीसरी जरूरत है कि हमारे विद्यार्थी आध्यात्मिक रूप से सशक्त रहे ताकि ध्यान को एकाग्र करने में दिक्कत ना हो, चौथी बात शरीर को व्यायाम के माध्यम से तपाना भी जरूरी है, और ये सभी कार्य अर्ली राइजर ही कर सकते है क्योंकि ये कार्य शांत माहौल में करने से ही संपन्न होते है। आज सबसे बड़ी कठिनाई ये है वर्तमान युवा पीढ़ी प्रातः जल्दी उठने में पीछे है, रात को दो तीन बजे तक जगना और फिर दस ग्यारह बजे तक देर तक सोना, उसके बाद जल्दबाजी में ऑफिस जाना या पढ़ाई लिखाई करना, भोजन के रूप में फाइबर रहित भोजन करना, इससे जीवन तबाह किया जा रहा है।
जब हम सुबह देर से उठते है तो स्वास्थ्य संबंधी सभी समस्याएं उत्पन्न होती है। यहां मैं एक बात विशेषरूप से नॉर्थ इंडियन के लिए कहना चाहता हूँ कि वो अपने भोजन को लिक्विड युक्त करें क्योंकि उत्तरी भारतीयों के भोजन में और खासकर युवा पीढ़ी के भोजन में पानी की बहुत कमी होती है। ये लोग सूखा भोजन, जिसमें मैदा अधिक है, उससे युवाओं का स्वास्थ्य बिगड़ने लगता है। अगर आप दक्षिणी क्षेत्र के भोजन को देखेंगे तो उसमें रसम तथा सांभर को देखेंगे तो उसमें अधिकतर लिक्विड ही होता है, जिससे सभी का स्वास्थ्य ठीक रहता है। लोग कम पानी पीते है, जो स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक है। खैर इन सब बातों को यहां विमर्श के लिए हम नहीं है, हम तो इस लेख में एकांत और मानव निर्माण की बात कर रहे है। जब हम अधिक समय तक भीड़ में रहते है और उन्हीं जैसा व्यवहार करते है तो हमारी चिंतन करने की शक्ति का ह्रास होता है और हम भीड़ बनकर रह जाते है, जिससे विद्यार्थियों के व्यक्तित्व निर्माण में बाधा आती हैं। अगर किसी का जीवन अधिक समय तक भीड़ का हिस्सा रहेगा तो वह आध्यात्मिक रूप से उत्थान नहीं कर पाएंगे।
हमे क्यों भीड़ का हिस्सा बनने को उत्साहित किया जाता है। मैं यहां भीड़ तथा समाज में अंतर करना चाहता हूँ कि सामाजिक होना तथा भीड़ का हिस्सा होने में बहुत बड़ा अंतर है। हमे अपने बच्चों को भीड़ का हिस्सा बनने से रोकना होगा, तभी वो नौजवान राष्ट्र के काम आयेंगे, तभी वो मानसिक रूप से सशक्त बनेंगे, तभी वो तर्कशील बनेंगे, तभी हमारी युवा पीढ़ी अथवा विद्यार्थी विश्लेषण करने वाली बनेगी। राष्ट्र और समाज को सशक्त बनाना है तो हमे ऐसी युवा पीढ़ी तैयार करनी है जो देश को एक ऐसी लीडरशिप दें जो अपने राष्ट्र के लिए सिंह की तरह दहाड़े तथा हर उस व्यक्ति से प्रश्न करें , जिनके हाथ में राष्ट्र की प्रगति की जिम्मेदारी है। हम बार बार एकांत की बात इस लिए कर रहे है क्योंकि एकांत में हमारे पास अपने समय के सदुपयोग के लिए अधिक अवसर होते है, हम अपने समय को बचा सकते है, और उस बचे हुए समय को अपने व्यक्तित्व विकास में लगा सकते है, हमारे विद्यार्थी खुद को काबिल बनाने में लगाएं, खुद ईमानदार बनने में लगाएं, एकांत में बैठकर हमारे विद्यार्थी अपने ध्यान को एकाग्र करने का अभ्यास करेंगे, हमारे युवा एकांत में बैठकर अपने भीतर की ताकत और कमियों का आंकलन करने का समय मिलता है, इसके साथ ही हम अपने राष्ट्र वा समाज की महत्ती जरूरतों को पहचाने ताकि युवाओं का जीवन राष्ट्र, समाज तथा परिवार के काम आवे।
एकांत का मतलब यही है कि हम अपने विद्यार्थी बच्चों को ऐसी जगह उपलब्ध कराएं , जहां बैठकर वो शांति का अनुभव करें, एकाग्रता का अनुभव करें, जहां बैठकर जीवन को आगे बढ़ाने के लिए अभ्यास करें, तभी हमारे राष्ट्र का एक एक नागरिक देश को सशक्त बनाने में अपना योगदान दे पाएंगे। यहां एक बात और स्पष्ट करने की है कि वह एकांत ऐसा स्थान हो जहां कोई मोबाइल ना हो,वहां कोई लैपटॉप अथवा कंप्यूटर ना हो, क्योंकि इससे हमारे विद्यार्थियों का ध्यान भटक सकता है। मैं यहां एक बहुत बड़ी बात कहना चाहता हूँ कि अगर हमारे बच्चों के पास मोबाइल या लैपटॉप होंगे तो वो भटकाने वाली गतिविधियों की तरफ बढ़ सकते है, इसी लिए हमे एकांत के सही अर्थ को समझने की जरूरत है। एकांत का अर्थ शांति है, एकांत का अर्थ हम खुद बाहरी वातावरण से दूर रखे, जिससे जीवन में सजगता आए। आज की भागमभाग जिंदगी में हमे भीड़ से बचने की जरूरत है, भीड़ का हिस्सा बनेंगे तो हमारे विद्यार्थी या युवा अपनी जिम्मेदारी से बचने की कोशिश करते है। भीड़ किसी भी व्यक्ति के गुणों को खत्म करती है। युवाओं को सशक्त करना है तो एकांत का जीवन जीते हुए खुद को सशक्त बनाएं।
जय हिंद, वंदे मातरम
