हरियाणा के सिरसा जिले के गांव नाथूसरी कलां में आयोजित एक अनोखी और प्रेरणादायक शादी की रस्म ने पूरे क्षेत्र का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। परंपरागत रूप से लड़कों की शादी में निकाली जाने वाली बनौरी इस बार बेटी के लिए आयोजित की गई। गांव के पूर्व रजिस्ट्रार देवेंद्र कासनियां की बेटी आरजू को घोड़ी पर बैठाकर पूरे सम्मान और शाही अंदाज में बनौरी निकाली गई, जिसने समाज को बेटा-बेटी समानता का सशक्त संदेश दिया।
बेटी आरजू के लिए अनोखी बनौरी—बदलाव की नई दिशा
आमतौर पर घोड़ी चढ़ने की रस्म लड़कों से जुड़ी मानी जाती है, लेकिन इस बार गांव ने पुरानी सोच को पीछे छोड़ते हुए एक नई मिसाल पेश की।
आरजू, जो 30 नवंबर 2025 को आईपीएस अधिकारी सुधीर के साथ विवाह बंधन में बंधने जा रही हैं, वर्तमान में UPSC की तैयारी कर रही हैं और अपने परिवार व गांव के लिए प्रेरणा स्रोत बनी हुई हैं। परिवार ने उनकी मेहनत और उपलब्धियों का सम्मान करते हुए यह विशेष बनौरी निकाली।
आरजू के चाचा अनिल कासनियां ने बताया कि वे इस अवसर को यादगार बनाना चाहते थे। “हमारी बेटी किसी से कम नहीं है। उसे वही सम्मान मिला है, जो एक बेटे को मिलता है,” उन्होंने कहा।
बनौरी के दौरान परिवार और ग्रामीणों ने डीजे पर नाचकर खुशी का इज़हार किया और पूरे आयोजन में उत्साह देखने लायक था।
आरजू ने कहा, “मेरे माता-पिता ने हमेशा मुझे बेटे की तरह सम्मान और समर्थन दिया। आज यह बनौरी मेरे लिए गर्व का क्षण है।”
समाज में सकारात्मक बदलाव की दिशा
अनिल कासनियां ने इस पहल को समाज की नई सोच का प्रतीक बताते हुए कहा, “बेटियां हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं। पहले जहाँ उन्हें सीमाओं में बांधा जाता था, वहीं अब शिक्षा और जागरूकता के कारण समाज की सोच बदल रही है।”
उन्होंने आगे कहा कि यह कदम सिर्फ एक रस्म नहीं, बल्कि gender equality का मजबूत संदेश है, जिसे समाज में फैलाया जाना चाहिए।
गांव में बेटियों को सम्मानित करने की परंपरा
गांव नाथूसरी कलां में पहले से ही बेटियों को प्रोत्साहित करने की सुंदर परंपरा है। हर साल बोर्ड परीक्षा में उत्कृष्ट अंक प्राप्त करने वाली बेटियों को सम्मानित किया जाता है।
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प्रथम स्थान: ₹5100
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द्वितीय स्थान: ₹3100
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तृतीय स्थान: ₹2100
इस पहल का उद्देश्य बेटियों में शिक्षा के प्रति उत्साह बढ़ाना और उनका आत्मविश्वास मजबूत करना है।
समानता का मजबूत संदेश
बेटी की बनौरी निकालने का यह कदम केवल एक शादी की रस्म नहीं, बल्कि समाज में हो रहे परिवर्तन का स्पष्ट संकेत है।
गांव नाथूसरी कलां में आयोजित यह कार्यक्रम दिखाता है कि बेटियां अब हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं और उन्हें वही अधिकार तथा सम्मान मिल रहा है, जो सदियों से बेटों को मिलता आया है।
आज के दौर में जब बेटियां शिक्षा, प्रशासन, खेल और अन्य क्षेत्रों में झंडे गाड़ रही हैं, ऐसे प्रयास पूरे समाज को सकारात्मक दिशा देने वाले हैं। यह पहल न केवल गांव बल्कि पूरे प्रदेश के लिए प्रेरणादायक उदाहरण बन गई है।
निष्कर्ष
नाथूसरी कलां की इस अनोखी परंपरा ने साबित कर दिया कि जब समाज बदलाव का संकल्प लेता है, तो पुरानी प्रथाएँ भी नई सोच के साथ और बेहतर रूप में निभाई जा सकती हैं।
यह बनौरी सिर्फ आरजू की नहीं, बल्कि हर उस बेटी की जीत है, जो समानता और सम्मान की हकदार है।
